जिंदगी ट्रेन की खिड़की से

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ट्रेन की खिड़की से झँकती मेरी खामोश निगाहें ,दिल में कुछ मीठे एहसास जगा जाती है
और पास गुजरने वाली सर्द हवायें मुझे भागती पटरियों से कुछ दूर पहुचा जाती हैं ||

सड़कों पे खेलते बच्चे मुझे खुद की तस्वीर दिखाते हैं
और उनकी मस्ती में जिंदगी का हर खोया पल हम फिर दोहराते हैं

उनका पेड़ पे पत्थर मारना हमसे भी बेर गिरने का इंतेज़ार करती है
और वो बेर चुराने हम भी हाथ बढ़ाते हैं पर खुद को खिड़की के इस ओर पाते हैं

उन नन्ही होठों की सच्ची मुस्कानें वो शैतानियाँ, वो बेफ़िक्र अदायें
उनकी टोली में मिलने कदम बढ़ाते हैं पर खुद को खिड़की के इस ओर पाते हैं

वो उड़ती पतंगे, वो क्रिकेट का शॉट, वो पहिए दौड़ती कदमें
हर उन पलों को जीने को दिल चाहता है पर खिड़की फिर बीच में आ जाता है

ये जंगल, चिड़ियाँ, उन्मुक्त गगन रंग बिरंगी तस्वीर बनाते हैं
और खिड़की के इस ओर हम खुद को बेरंग नज़र आते हैं

ये नदियाँ, मीलों तक फैले खेत, खामोशी में जीवन का एहसास करते हैं
और खिड़की के इस ओर हम भीड़ में भी खामोश नज़र आते हैं ||

स्टेशन पे रुकने पे भीड़ में बदहबास दौड़ते हर शक्स पे हस जाते हैं
और खिड़की के इस और खुद को उनमें से ही कोई एक पाते हैं ||

शाम को बंद होती खिड़कियों के साथ सारे एहसास भी खो जाते हैं
और बंद होती लाइटों के साथ हम फिर कहीं खो जाते हैं ||

अब खिड़की के इस और जिंदगी नही और उस ओर दुनियाँ नही है
खुशियाँ खिड़की के उस ओर रह गयी और हम इस और हैं ||

ट्रेन की रफ़्तार रुकती नही की हम रफ़्तार पकड़ लेते हैं
जिन खुशियों को जीने आये थे अब उन्हे बेच के जीते हैं ||

जिन्दगी पन्नों में …

जिन्दगी की राहों में चलते चलते ख्वाबों और एहसासों को दिल में समेटे हुए जिन्दगी आज खुद ही कहीं उलझ गयी,
बस अपनों शब्दों के माध्यम से सुलझाने की एक कोशिश कर रहा हूँ, साथ ही आपके सहयोग की अपेक्षा रखता हूँ |